हरिपुर नाम का एक छोटा सा गांव था। वहाँ एक गरीब माँ और उसका छोटा बेटा रहते थे।
माँ दिन में खेतों में मेहनत करती थी और रात को अमीर लोगों के घर जाकर बर्तन मांजती थी।
वह अपने बेटे से बहुत प्यार करती थी और हमेशा कहती थी,
“बेटा, पढ़-लिख लेना… ताकि तुझे मेरी तरह मेहनत न करनी पड़े।”
एक दिन माँ काम पर गई हुई थी। उधर उसका बेटा गांव के बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते-खेलते वह अचानक एक गड्ढे में गिर गया। बच्चे डर गए और जोर-जोर से चिल्लाने लगे। गड्ढा गहरा था और लड़के के पैर में चोट लग गई थी।
गांव के कुछ लोग वहाँ आए, लेकिन कोई नीचे उतरने की हिम्मत नहीं कर रहा था। तभी एक बूढ़ा किसान आया। उसने जल्दी से रस्सी लाई और अपनी जान की परवाह किए बिना गड्ढे में उतर गया। उसने बच्चे को धीरे-धीरे ऊपर निकाला।
उसी समय माँ को खबर मिली। वह दौड़ती हुई आई और अपने बेटे को गले लगाकर रोने लगी। बेटे ने दर्द में भी माँ से कहा,
“माँ, मैं बड़ा होकर बहुत पैसे कमाऊँगा… ताकि तुम्हें इतना काम न करना पड़े।”
उस दिन के बाद लड़का पहले से ज्यादा समझदार हो गया। वह दिन में पढ़ाई करता और शाम को माँ के छोटे-मोटे कामों में मदद करता। साल बीतते गए। मेहनत और लगन से वही लड़का आगे चलकर गाँव का शिक्षक बन गया।
जब गाँव के लोग उसे सम्मान देने लगे, तब उसने सबके सामने अपनी माँ का हाथ पकड़कर कहा,
“आज मैं जो भी हूँ, अपनी माँ की मेहनत की वजह से हूँ।”
यह सुनकर उसकी माँ की आँखों में खुशी के आँसू आ गए, और हरिपुर गांव के लोग तालियाँ बजाने लगे।









